Wednesday, September 26, 2012

मेरे ख्वाब तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे...

मेरे ख्वाब तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे। 
पर उनको तिरस्कार भरी नज़रों से वैसे ही दूर कर देना जैसे किसी भिखारी को करते हैं।
हो सकता है वो उम्मीद भर के नज़रों में तुम्हारी तरफ़ हाथ फैलाये। तुम अपनी नज़रें फेर लेना।
उन नज़रों से तुम्हे कोई सरोकार नहीं। वो आँखें उम्मीद की रौशनी देख पाती हैं। पर उन्हें उम्मीद की रौशनी मत दिखाना। कहीं वो फिर प्यार का कर बैठें। उन्हें बेसहारा ही रहने देना।

अगर मेरे ख्वाब तुम्हारे पास सहारा पाने आएं।

आभार :
जबसे दुष्यंत कुमार की कविता "मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे" पड़ी है तबसे ये लाइन मेरे ज़ेहन में गूँज रही है किसी daemon thread की तरह पर गीत की जगह ख्वाब आ रहा है बार बार कविता लिखने वाला कविता किस भाव से लिखता है और हमारा मन उसको अपने हिसाब से परिवर्तित कर देता है

और सही भी है. मेरे ख्वाब शायद तुम्हारे पास सहारा पाने आयें।

--- अतुल रावत

Sunday, August 26, 2012

ढोंग



मुझे खुशी  का ढ़ोंग करने दो।
मुझे प्यार का ढ़ोंग करने दो।
मुझे होने का ढोंग करने दो।
मुझे जीने का ढोंग करने दो।

मैं खुश हूँ, मुझे प्यार है, मेरा वजूद है, मैं जिंदा हूँ।

इश्वर, मेरी मौत एक ढोंग न करना।

--- अतुल रावत

Wednesday, July 25, 2012

नोक झोंक


"मैं तुमसे? नहीं तो!!! क्यूँ? मैं क्यूँ करूँगा तुमसे?" उसके बार बार पूछने पे की मैं उस से प्यार करता हूँ मुझे कहना ही पड़ा। और वो फिर मूँह फूला के बैठ गयी। मुझे पता था ऐसा वो तभी करती है जब उसको थोडा नोक झोंक करने का मन करता है। उसे भी पता था की मैं ये जान जानबूझ कर कर रहा हूँ। पर कभी कभार प्यार है इसके एहसास की जरुरत होती है उसको। इसके बाद के सारे स्टेप्स एक रोबोट की भाँती follow होते हैं।
step 1: थोड़ी देर तक टेढ़ी आँख से उसको अपनी तरफ मुह फुलाए हुए तकते देखता हूँ। फिर "ठीक है बाबा करता हूँ।"
step 2: पक्का?
step 3: "हाँ बाबा पक्का।"
step 4: "कितना?"
step 5: "खूब सारा!"
step 6: "बहुत सारा वाला खूब सारा?"
step 7: "हाँ. बहुत सारा वाला खूब सारा."
step 8: हंसी ऐसे वापस आती है जैसे किसी ने बाँध का पानी छोड़ दिया हो। "फिर ठीक है।"

और फिर वो वापस अपने काम मैं लग जाती है। शायद ये उसका बचपन है जो चाहता है अपने बच्चों के साथ मैं भी उसे बच्चे की तरह ही प्यार करूँ।

--- अतुल रावत

Sunday, July 22, 2012

शहर और गाँव


मैं  शहर मैं रहता हूँ  : मैं अस्पताल में पैदा हुआ.
मैं गाँव मैं रहता हूँ : मैं घर में  पैदा हुआ। 
मैं शहर में  बीमार  हुआ : पिताजी चिंता में  हैं , कितना insurance कवर होगा।
मैं गाँव में  बीमार हुआ : पिताजी ज़मीन बेच के डॉक्टर के पास लाये हैं।
मैं  शहर मैं रहता हूँ  : पिताजी दुपहिया  बेच के car लेने वाले हैं।
मैं गाँव मैं रहता हूँ : पिताजी कहते हैं वो और गाय  लेंगे।
मैं  शहर मैं रहता हूँ  : पिताजी कहते हैं वो लोन लेके नया business  शुरू करेंगे।
मैं गाँव मैं रहता हूँ : पिताजी कहते हैं लोन किसानों  को मार डालता है ।
मैं  शहर मैं रहता हूँ  : सरकार  कहती है पिताजी का business अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है ।
मैं गाँव मैं रहता हूँ : सरकार कहती है पिताजी का शहर जाना एक समस्या  है जिसे पलायन कहते हैं।

मैं  शहर मैं रहता हूँ  : कल की सुबह उम्मीद भरी ही।
मैं गाँव मैं रहता हूँ : कल फिर एक सँघर्ष  है।

Sunday, July 8, 2012

जद्दोजेहद


कभी अपने साथ जी के देखा है? ओशो कहते हैं दिन मैं ऐक बार अपने से बात कर लिया करो, नहीं तो तुम दुनिया मैं सबसे बेहतरीन इंसान से बात करने का मौका चूक जावोगे। मैंने कई बार अकेले बैठ के देखा है। कारण कुछ नहीं था। बस ऐसे ही अपने से बात करने की कोशिश करी। कभी खुद से चाह के या कभी दुनिया की आपाधापी मैं थोडा पीछे रह गया तो सोचा थोडा सोचूं क्या किया जो नहीं करना था। थोडा अपने से बातें कर लूँ। शायद कोई जवाब मिल जाये। जैसे फिल्मों मैं दिखाते हैं, शीशे के आगे हीरो अपने आप को धुतकारता है "you are such a stupid ______!!!" वैसे ही। पर नहीं मैं नहीं सोच पता। जैसे ही सोचता हूँ तो वो ही बातें याद आती है, नहीं बातें नहीं गलतियाँ याद आती हैं और फिर आगे कुछ सोचा नहीं जाता। बस फिर बैठ जाता हूँ चुपचाप. ऐसा नहीं है की कुछ सोच नहीं पता, बस भाग जाता हूँ अपने आप से। हमेशा की तरह. छुप जाता हूँ अपने ही इंसानी खोल के अन्दर ऐक आई डोंट केयर का attitude ले के।

फ़र्ज़ करो तुम और तुम दो अलग अलग इंसान ऐक ही कमरे मैं बैठे हो... क्या बात करोगे?
दोनों ऐक दुसरे के बारे मैं सब कुछ जानते हो... क्या करोगे? नज़रें चुराओगे या मिलाओगे? शायद चुप ही रहोगे... मेरी तरह...


--- अतुल रावत

Sunday, June 17, 2012

जाने क्यूँ?



मैं लिख रहा हूँ बस लिखने की खातिर। मैं जब अकेला होता हूँ, मेरा मन कहीं टिक के नहीं  रहता। मैं कुछ कुछ सोचता रहता हूँ। एक ख्याल के ऊपर दूसरा ख्याल जैसे duster से कोई blackboard पे लिखते लिखते मिटा देता हो। मैं क्या सोचता हूँ और क्यूँ? ये तो शायद मैं भी नहीं जानता। शायद दिमाग को जीने के लिए ख्यालों की जरुरत होती है।
BMTC बस मैं सफ़र करते हुए अक्सर मुझे मजदूर मिल जाते हैं जो दो वक़्त की रोटी के लिए भी जद्दोजेहत कर रहे हैं। उनको देख के मैं अपने को खुशनसीब मानता हूँ। ऐसा क्या मैंने किया जो मुझे इतना कुछ मिला और उनसे ऐसा क्या गुनाह हो गया। जब मुस्कुराते हुए उन्हें टीवी की दूकान के बहार देखता हूँ। सहसा मेरे अन्दर दया का भाव उमड़ पड़ता है। जनता हूँ ये गलत है पर जाने क्यूँ? सोचता हूँ इनके सपनों  को किनकी नज़र लग गयी है। कितनी छोटी छोटी चीज़ें इनको ख़ुशी देती हैं। मेरे घर मैं 32 इंच का LCD TV  है, पर वो भी मैंने आजतक इतने चाव से नहीं देखा। पर फिर लगता है मैं क्या इनसे अलग हूँ। बस मेरे सपने ही तो अलग हैं। पर क्या कोई ये सोचता होगा की मेरे सपनों  को किसकी नज़र लगी है? जाने क्यूँ मैं सोचने लगता हूँ?

Wednesday, June 13, 2012

तुम और शून्य





तुम्हे पता है!!! मैं अक्सर फुर्सत लेके तुम्हें सोचता हूँ।  तुम्हें  शायद  अजीब लगता हो और शायद अजीब है भी। पर इसका भी अपना ही एक मजा है। वो ही मजा जो एक व्हिस्की का ग्लास ले के आराम से पीने मैं है  शायद वोही नशा तुम्हारी याद का है। मैं तुम्हारी याद के साथ कोई समझौता नहीं चाहता। इसीलिए जब तुम याद आती हो तो आराम से एक एक याद, याद करता हूँ।


जब तुम्हें याद करने की कोशिश करता हूँ तो मन एक टक शून्य में खो जाता है। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। शायद कुछ भी याद नहीं या बहुत कुछ याद करने को है। 


मुझे याद नहीं कैसे तुम्हारे बाल कभी कभी मेरे चेहरे को छू जाते थे, उनमे भीनी भीनी किसी शेम्पू की खुशबू थी जो थोड़े टाइम बाद मुझे अच्छे लगनी लगी। कौन सा शेम्पू था?
मुझे याद नहीं तुम्हारे साथ की गर्माहट मेरे वजूद को कैसे पूरा कर देती थी? मुझे तुम्हारी हथेलियों का आकार भी तो याद नहीं है। जाने कैसे वो मेरे हाथों मैं जगह बना लिया करती थी। जैसे पानी कैसे भी आकार ले लेता है, शायद वैसे ही  तुम्हारी हथेलियाँ मेरी हथेलियों मैं समां जाया करती होंगी इतना पत्थरदिल  मैं कैसे हो गया मेरे लिए भी ये surprise है जाने कैसे मैं भूल गया की जब तुम रोती थी तो क्या तुम मुझे गले से लगा लेती थी!!! जो मेरी शर्ट में नमी है वो तुम्हारे आँसू तो नहीं!!! क्या  तुम्हारे दिल की धड़कन,जो रोते हुए मेरे सीने से महसूस  होती थी, क्या अब भी मेरे सीने में ही कहीं दफ़न है!!!

कुछ भी तो याद नहीं मुझे। सब शून्य है। तुम कौन हो, में कौन हूँ!